भारत के राष्ट्रपति के अधिकार, शक्तियाँ और कार्य


भारत के राष्ट्रपति के शक्तियाँ दो भागों में बांटा जा सकता हैं
1)      सामान्यकालीन शक्तियाँ
2)      संकटकालीन शक्तियाँ
सामान्यकालीन शक्तियाँ
1)      कार्यपालिका अथवा प्रशासनिक शक्तियाँ
2)      विधायी शक्तियाँ
3)      वित्तीय शक्तियाँ
4)      न्यायिक शक्तियाँ
5)      राज्यों से सम्बन्धित अधिकार
कार्यपालिका अथवा प्रशासनिक शक्तियाँ  – अनुच्छेद 53 के अनुसार संघ कार्यपालिका की शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी तथा वह इसका प्रयोग संविधान के अनुसार स्वंय या अपने अधीनस्थ पदाधिकारियों द्वारा करेगें। राष्ट्रपति कार्यपालिका शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद्, जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होता है, की सलाह पर करेगें और 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् की सलाह मानने के लिए बाध्य कर दिया गया है
(क) महत्वपूर्ण अधिकारियों की नियुक्ति व पदच्युति की शक्ति राष्ट्रपति भारत संघ के अनेक महत्वपूर्ण अधिकारियों की नियुक्ति करते हैं जैसे प्रधानमन्त्री, उनकी सलाह से अन्य मन्त्री, राज्यों के राज्यपाल, उच्चतम न्यायालय और उच्च के न्यायाधीश, महालेखा परीक्षक, संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और उनके सदस्य और विदेशों में राजदूत आदि। इसके अलावा भारत के राष्ट्रपति अनतर्राज्य परिषद्, निर्वाचन आयोग, वित्त आयोग, राज भाषा आयोग तथा पिछड़े हुए वर्गों की दशा सुधार सम्बधी आयोग की नियुक्ति करते तथा मन्त्रियों को, राज्यपाल को, महान्यायवादी को पद से हटा भी सकते हैं।
(ख) शासन संचालन सम्बन्धी शक्तियाँ वह संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक, नियन्त्रक व महालेखा परीक्षक की शक्ति और सर्वोच्च न्यायालय के अधिकारियों व कर्मचारियो की नियुक्ति के सम्बन्ध में नियमों का निर्माण भी करते हैं और केन्द्रीय मन्त्रीयों को विभाग आदि वितरण भी करते हैं।
(ग)  वैदेशिक क्षेत्र में शक्ति भारतीय संघ का वैधानिक प्रमुख होने के नाते राष्ट्रपति वैदेशिक क्षेत्र में भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। विदेशों से सन्धियों और समझौते भी राष्ट्रपति के नाम से ही होते हैं और इसकी संसद से पुष्टि आवश्यक हैं।
(घ)  सैनिक क्षेत्र में शक्ति राष्ट्रपति तीनों सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति होता है। वह तीनों सेनाओं के सेना अध्यक्षों की नियुक्ति करते है। प्रतिरक्षा सेवाओं, युद्ध और शान्ति आदि के विषय में कानून की शक्ति केवल संसद को प्राप्त हैं। अतः भारत का राष्ट्रपति संसद की स्वीकृति के बिना न तो युद्ध की घोषणा कर सकते हैं और न ही सेनाओं का प्रयोग कर सकते हैं।
विधायी शक्तियाँ – भारत के राष्ट्रपति भारतीय संघ की कार्यपालिका का वैधानिक प्रधान तो हैं और उन्हें भारतीय संसद का अभिन्न अंग भी माना गया हैं और इस रुप में राष्ट्रपति को विधायी क्षेत्र की विभिन्न शक्तियाँ प्राप्त हैं
(क) विधायी क्षेत्र का प्रशासन वह संसद के अधिवेशन बुलाते हैं और समाप्ति की घोषणा करते हैं। वह लोकसभा को उसके निश्चित काल से पूर्व भी भंग कर सकते हैं। संसद के अधिवेशन के प्रारम्भ में राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में भाषण देते हैं। उनके द्वारा अन्य अवसरों पर भी संसद को संदेश भेजने या उनकी बैठकों में भाषण देने का कार्य किया जा सकता हैं।
(ख) सदस्यों को मनोनीत करने की शक्ति भारत के राष्ट्रपति आंग्ल-भारतीय समुदाय के 2 व्यक्तियों को लोकसभा में और साहित्य, कला, विज्ञान, खेल अथवा समाज सेवा क्षेत्र के 12 व्यक्तियों को राज्यसभा में मनोनीत करते हैं।
(ग)  विधेयकों पर निषेधाधिकार का प्रयोग - अनुच्छेद 31 (1) में वर्णित विषय आदि से सम्बंधित विधेयक वह किसी भी विधेयक को अनुमति दे सकते है, उसे पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकते है तथा उस पर अपनी अनुमति रोक सकते है, लेकिन धन विधेयकों पर राष्ट्रपति को अनिवार्य रूप से अनुमति देनी होती है तथा उसे पुनर्विचार के लिए भी वापस नहीं भेज सकता है। 44वें संविधान संशोधन द्वारा राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद् की सलाहों को केवल एक बार पुनर्विचार के लिए प्रेषित करने का अधिकार दिया गया है, यदि परिषद् अपने विचार पर टिकी रहती है तो राष्ट्रपति उसी सलाह को मानने के लिए बाध्य होगे।

भारत के राष्ट्रपति की वीटो शक्तियाँ –
(1)     पूर्ण वीटों – जब राष्ट्रपति किसी विधेयक को अनुमति नहीं देते तो यह कहा जाता हैं कि उन्होंने पूर्ण वीटो की शक्ति का प्रयोग किया हैं लेकिन राष्ट्रपति इस वीटो की शक्ति का प्रयोग ऐसे विधेयक पर अनुमति न प्रदान करके कर सकते हैं जो ऐसी सरकार द्वारा पारित किया गया हो, जो विधेयक अनुमति देने के पूर्व ही त्याग-पत्र दे दे और नई सरकार विधेयक पर अनुमति न देने की सिफारिश करे।
(2)     निलम्बनकारी वीटो – जब राष्ट्रपति किसी विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद के पास भेजते हैं तो इसे निलम्बनकारी वीटो कहा जाता हैं
(3)     जेबी वीटो – जब राष्ट्रपति संसद द्वारा पारित विधेयक न अनुमति देते न ही उस विधेयक को वापस भेजते हैं तो इसे जेबी वीटो कहा जाता हैं। 1986 में संसद द्वारा पारित भारतीय डाक (संशोधन) विधेयक के सन्दर्भ में तात्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह किया था।
(घ)  अध्यादेश जारी करने की शक्ति अनुच्छेद 123 के अनुसार जब संसद का सत्र न चल रहा हो तथा किसी विषय पर तुरंत विधान बनाने की आवश्यकता हो तो अध्यादेश द्वारा विधान बनाया जा सकता है। इस तरह के बनाए गए विधान अध्यादेश संसद के विधान की ही तरह होते हैं, लेकिन अध्यादेश अस्थायी होता है। राष्ट्रपति अध्यादेश अपनी मंत्रिपरिषद् की सलाह से जारी करते है। संसद का अधिवेशन होने पर अध्यादेश संसद के समक्ष रखा जाना चाहिए यदि संसद उस अध्यादेश को अधिवेशन प्रारंभ होने की तिथि से छः सप्ताह के अन्दर पारित नहीं कर देती, तो वह स्वयं ही निष्प्रभावी हो जाएगा। 44वें संविधान संशोधन द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि राष्ट्रपति के अध्यादेश निकालने की परिस्थितियों को असद्भावनापूर्ण होने का संदेह होने पर न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है
वित्तीय शक्तियाँ – राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ में संसद के दोनों सदनों के सम्मुख भारत सरकार की उस वर्ष के लिए आय और व्यय का विवरण रखवाते हैं और उनकी आज्ञा के बिना धन विधेयक अथवा वित्त विधेयक और अनुदान मांगे लोकसभा में प्रस्तावित नहीं किया जा सकता हैं।
      भारत की आकस्मिकता निधी से आकस्मिक व्यय के लिए इस निधि से धनराशि दे सकते हैं और इसके लिए बाद में संसद की स्वीकृति आवश्यक हैं।
न्यायिक शक्तियाँ - राष्ट्रपति किसी सैनिक न्यायालय द्वारा दिए गए दंड को, कार्यपालिका के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत दिए गए दंड को, कार्यपालिका के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत दिए गए दंड को तथा अपराधी को मृत्यु दंड दिए जाने की स्थिति में क्षमा दान दे सकते है।  दंड को कम कर सकता है, दंडादेश की प्रकृति को बदल सकते है। दंड को निलंबित करने का भी राष्ट्रपति को अधिकार है।
राष्ट्रपति किसी सार्वजनिक सार्वजनिक महत्त्व के प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय से अनुच्छेद 143 के अधीन परामर्श ले सकते हैं, लेकिन वह यह परामर्श मानने के लिए बाध्य नहीं हैं।


संकटकालीन शक्तियाँ – भारतीय संविधान के अनुसार तीन प्रकार के संकट के बारे बताया गया हैं अनुच्छेद 352, 356, और 360 में दिया गया है –
अनुच्छेद 352 - युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह से यदि भारत या उसके किसी भाग की सुरक्षा संकट में हो। भारत में इस अनुच्छेद का प्रयोग वर्ष 1962 में चीनी आक्रमण, 1965 तथा 1971 में पाकिस्तानी आक्रमण के समय और वर्ष 1975 में आंतरिक अशांति के आधार पर आपातकाल की घोषणा की गई थी। 44वें संविधान संशोधन द्वारा आन्तरिक अशांति के स्थान पर सशस्त्र विद्रोह शब्द जोड़े गए और अनुच्छेद 20 तथा 21 में दिए गए मौलिक अधिकार आपातकाल में भी स्थगित नहीं किये जायेंगे और 38वें संविधान संशोधन को रद्द कर दिया जिसमें व्यवस्था की गई थी राष्ट्रपति द्वारा 352वें अनुच्छेद के अन्तर्गत की गई संकटकालीन घोषणा को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। इस प्रकार राष्ट्रपति द्वारा लागू की गई आपातकालीन घोषणा को न्याय-योग्य बना दिया गया।
अनुच्छेद 356 – राज्य में संवैधानिक तन्त्र के विफल होने पर संसद द्वारा एक बार प्रस्ताव पास कर राज्य में 6 माह के लिए राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता हैं 44वें संविधान संशोधन के पूर्व राज्य में राष्ट्रपति शासन की अधिकतम अवधि 3 वर्ष थी जो इसके बाद हटा दिया गया। यदि राज्य में राष्ट्रपति शासन के एक वर्ष की अवधि के बाद इसे और अधिक समय के लिए जारी रखने का प्रस्ताव तभी पारित किया जा सकेगा जबकि इस प्रकार का प्रस्ताव पारित किए जाने के समय अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत संकटकाल लागू हो और चुनाव आयोग यह प्रमाणित कर दे कि राज्य में चुनाव करवाना सम्भव नहीं हैं और किसी भी परिस्थिती में 3 वर्ष के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू नहीं रखा जा सकेगा।
अनुच्छेद 360 वित्तीय संकट – जब भारत के वित्तीय स्थायितव या साख को खतरा हैं तो उस परिस्थिति में मंत्रिमंडल की सिफारिश पर वह वित्तीय संकट की घोषणा कर सकते हैं।
इस वही व्यवस्था जो अनुच्छेद 352 में दिया हैं।
संघ तथा राज्य सरकारों के अधिकारियों के वेतनों में, जिनमें उच्चतम और उच्च न्यायानयों के न्यायाधीश भी शामिल होगें आवश्यक कमी की जा सकती हैं।
राष्ट्रपति केन्द्र तथा राज्यों में धन सम्बन्धी बंटवारे के प्रावधानों में संशोधन किया जा सकते हैं।
राष्ट्रपति राज्य सरकारों को इस बात के लिए बाध्य कर सकते हैं कि राज्य के समस्त वित्त विधेयक उसकी स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किए जाएं
भारत के राष्ट्रपति की वास्तविक स्तिथि
अनुच्छेद 53 (1) के अनुसार – संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी तथा वह इसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार या तो अपने अधीनस्थ पदाधिकारियों के द्वारा करेगें।
अनच्छेद 74 (1) के अनुसार – राष्ट्रपति को अपने कार्यों का सम्पादन करने में सहायता और मन्त्रणा देने के लिए एक मन्त्रिपरिषद् होगी, जिसका प्रधान प्रधानमन्त्री होगा।
प्रारुप समिति के अध्यक्ष डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि राष्ट्रपति की वही स्थिति हैं जो कि ब्रिटिश संविधान में सम्राट की हैं।
पं. जवाहरलाल नेहरु ने कहा था कि हम सरकार की इस मन्त्रिमण्डलीय विशेषता पर बल देना चाहते हैं कि वास्तविक शक्ति मन्त्रिमण्डल और व्यवस्थापिका में निहित हैं न कि राष्ट्रपति में। हमने अपने राष्ट्रपति को वास्तविक शक्ति नहीं दी हैं वरन् हमने उसके पद को सत्ता और प्रतिष्ठा मे विभूषित किया हैं
संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्रप्रसाद ने कहा था कि संविधान में कोई ऐसी बात नहीं हैं जिसके कारण राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल की सलाह मानने के लिए बाध्य हो, फिर भी यह आशा की जाती हैं कि इंग्लैण्ड का राजा हमेशा अपने मन्त्रियों की सलाह को मानता हैं, वैसी ही प्रथा इस देश में स्थापित हो जायगी और राष्ट्रपति सब बातों में केवल नाममात्र का शासक रहेगा।
पं. नेहरु ने 7 जुलाई 1959 में फिर दोहराया कि हमारा संविधान राष्ट्रपति को इंग्लैण्ड के सम्राट जैसी स्थिति प्रदान करता हैं। अगर ऐसा नहीं हो तो मन्त्रिमण्डल और संसद के उत्तरदायित्व के प्रश्न को हानि पहुंचेगी।

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